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नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की,भागवत कथा में उमड़े भक्तगण

रिपोर्टर : ओमप्रकाश मूंढ बाड़मेर/बाटाडू÷नंदजी के घर जब भगवान का प्रवेश हुआ तो तीनों लोकों के देवता ख़ुशी से झूमकर नाचने लगे और फूलों की बरसात...

रिपोर्टर : ओमप्रकाश मूंढ
बाड़मेर/बाटाडू÷नंदजी के घर जब भगवान का प्रवेश हुआ तो तीनों लोकों के देवता ख़ुशी से झूमकर नाचने लगे और फूलों की बरसात करने लगे। भगवान के दर्शन पाने के लिए खुद महादेवजी ब्राहण का रूप धारण कर नंदजी के घर आए एवमं अपनी जिद से भगवान के दर्शन करने में सफलता पाई। भगवान के जन्म का प्रसंग सुनाते ही श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से पुरे पंडाल को गुंजायमान कर दिया।

भगवान के विभिन्न रूपों तथा देवताओं का स्वांग धरे दर्शकों का मन मोहित कर दिया। भक्तों के मन में जब श्रद्धा हो तो भगवान घट-घट और पल-पल में विद्यमान हैं ऐसा ही कुछ सुनने को मिला  परेऊ गाँव के पिराणी साईयों की ढाणी स्थित  रूपनाथ महाराज की समाधि स्थल पर महंत श्रीमोटनाथ महाराज लीलसर धाम व महंत श्रीओंकार भारती महाराज के पावन सानिध्य में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन।
भगवान श्रीकृष्ण विष्णु जी के आठवें अवतार माने जाते हैं।यह विष्णु का सोलह कलाओं पूर्ण भव्यतम अवतार है। श्रीराम तो राजा दशरथ के यहां एक राजकुमार के रूप में अवतरित हुए थे,जबकि श्रीकृष्ण का प्राकट्य आततायी कंस के कारागार में हुआ था।
*नंदोत्सव में झूम उठे श्रद्धालु-श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्री वसुदेव के पुत्र रूप में हुआ था।कंस ने अपनी मृत्यु के भय से बहिन देवकी और वसुदेव को कारागार में कैद किया हुआ था।कृष्ण जन्म के समय घनघोर वर्षा हो रही थी।चारों तरफ घना अंधकार छाया हुआ था। श्रीकृष्ण का अवतार होते ही वसुदेव व देवकी की बेड़िया खुल गई, कारागार के द्वार स्वंय ही खुल गए, पहरेदार गहरी निंद्रा में सो गए।वसुदेव किसी तरह श्रीकृष्ण को उफनती यमुना के पार गोकुल में अपने मित्र नंदगोपाल के घर ले गए। यहाँ पर नंद की पत्नी यशोदा को भी एक कन्या उत्पन्न हुई थी। वासुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को ले गए। कंस ने उस कन्या को पटककर मार डालना चाहा किन्तु वह इस कार्य में असफल ही रहा।श्रीकृष्ण का लालन-पालन यशोदा व नंद ने किया। बाल्यकाल में ही श्रीकृष्ण ने अपने मामा के द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसों को मार डाला और उसके सभी कु-प्रयासों को विफल कर दिया।अंत में श्रीकृष्ण ने आततायी कंस को ही मार दिया।श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का नाम ही जन्माष्टमी है।कथा के पांचवें दिन भी श्रोताओं की भारी भीड़ नजर आयी।वहीँ बच्चों व महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
इस दौरान परेऊ सहित आसपास के क्षेत्रों के सैकड़ो भक्त मौजूद रहे।

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